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कविता

गिरधर तुम आओ
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ज़ुल्म हो रहा है, सितम हो रहा है
सड़क पर सुता का ,हरण हो रहा है ।
बेटी हो अपनी , अगर हो पराई
समझों तुम अपनी, नहीं थी बुराई
नज़रों में प़ाकी , दिलों में सफाई
बरसती नियामत, बिखरती खुदाई
मगर आज देखो ,क्या हो रहा है ,
मानव के अन्तर , असुर सो रहा है ।
महफूज़ पी घर ,न महफूज़ बाबुल
निगेहवां देखें , जाती है मंजिल
भंवर बीच कश्ती, सहमा है साहिल
किनारे पर बैठे , कामुक वो कातिल
सुनाए फरियाद , गज़ब हो रहा है ,
मर्यादा का गुलशन,महक खो रहा है।
खोय जो अस्मत ,पीर होती पर्वत
इज्ज़त तो इज्ज़त है ,बहन या नर्तक
पल -पल है रोती , मरती है ताकत
जहां क्या जाने , जननी की गुर्बत
गिरधर तुम आओ, अरज हो रहा है ,
सिर कट का नारा, बुलंद हो रहा है।
गैरों की रस्में , छोड़ों ए यारों
कन्हा की विरासत, संभालों कुम्हारों
दानव की वृत्तियां, अब तुम सुधारों
सनातन की शिक्षा ,धरा पर उतारो
कलयुगी मती का , क्षरण हो रहा है,
गौतम का प्यारा , चमन रो रहा है ।
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रचनाकार- शेख जाफर खान

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शेख़ जाफ़र खान
शेख़ जाफ़र खान
साईंखेड़ा जिला-नरसिहपुर म.प्र.
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