कविता ••?उमर फै़याज़ पर्रे..एक शहीद?

कब तक हत्याएं बर्बरता से होती रहेंगी।
माताएँ कलेजे के टुकडे़ को रोती रहेंगी।।
कितने उमर फै़याज़ पर्रे यहाँ मिटाए जाएंगे।
कितने रुहों के सपने अरमान लुटाए जाएंगे।।
हे दिल्ली वालो चेतो,संसद में विचार करो।
समझौते छोड़ो अब,पाक-कफ़न तैयार करो।।
आर-पार की लड़ाई अब तो लड़नी ही होगी।
बेलगाम के नाकों नकेल अब डालनी ही होगी।।
अपनी हरक़तों से बाज नहीं आएगा ये पाक।
जब तक नहीं हो जाएगा सुनलो ज़िंदा खाक़।।
मारते,तन-अंग काटते और ज़िंदा तड़फाते हैं।
ये सोच रोंगटे खड़े और आँसू निकल आते हैं।।
एक वर्ष नहीं हुआ जिसको ख़ुशियाँ मिटा दी।
प्रेरणा युवाओं की थी आतंकियों ने हटा दी।।
शहीद होते,रिश्ते रोते तुम करते सिर्फ़ समझौते।
नहीं,कुछ और करो,न मिटें माँ लाल इकलौते।।
जब सैनिक भर्ती होता,हर रिश्ते में ख़ुशी बोता।
देश-सुरक्षा वो करे,उसकी सुरक्षा ये देश होता।।
सोचो समझो दिल्ली वालो और फ़रमान करो।
ये बर्बरता न हो चाहे उल्टा धरती-आसमान करो।।
सीने में सुलगी है जो चिंगारी ज्वालामुखी होने दो।
या मिटेंगे या मिटा देंगे अब आर-पार जंग होने दो।
दो कौड़ी का आदमी सैनिक को तमाचा मारता है।
हाथ बंधे ऐसे कि लहू का घूँट पी रह जाता है।।
अब हाथ खोलदो,ईंट का ज़वाब पत्थर से दो बोलदो।
बर्बरता नज़र नहीं आएगी कहो,भाव के भाव तोलदो।।
जयहिंद………………..
………….?•राधेयश्याम “प्रीतम”?

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