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कविता- हँसी ठिठोली कर लें आओ

कविता- हँसी ठिठोली कर लें आओ
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दुनिया के कुछ लोग हमेशा,
रहते हैं मुरझाए।
हँसी-ठिठोली कर लें आओ,
हर कोई मुस्काए।।

बीवी जिसकी कद्दू जैसी,
वह ककड़ी का भ्राता।
चलना पड़ता साथ कभी तो,
पति केवल शरमाता।।

पति मोटा होने की खातिर,
खाता रोज दवाई।
बीवी दुबराने को मीलों,
नाप रही लंबाई।।

अक्सर मुझको दिख जाते हैं,
बिना मेल के जोड़े।
उनकी भी कुछ चर्चा कर लें,
नहीं जा रहे छोड़े!!

उसकी बीवी गोरी-चिट्टी,
रहता है मतवाला।
हप्ते में इक बार नहाए,
ऊपर से है काला।।

जिसकी बीवी छोटी है वह,
हील उसे दिलवाता।
जिसकी बीवी लंबी चौड़ी,
पल्लू में छुप जाता।।

एक मनुज को देखा मैंने,
मोटा घोर निकम्मा।
बीवी जिसको डांटा करती,
रोती रहती अम्मा।।

बीवी झल्ला कर कहती है,
ख़तम हुआ है पैसा।
मैं जाती हूँ नोट कमाने,
घर देखो रे भैंसा।।

मैंने की बकवास यहाँ पर,
नहीं बजाना ताली।
मेरे कानों को खींचेगी,
घर जाते घरवाली।।

– आकाश महेशपुरी
दिनांक- 16/08/2019

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