कविता : शिक्षा धन अद्भुत अनुपम

घर-घर फैलेगा जब शिक्षा-दीप उजियारा।
विश्व-प्रमुख बनेगा उस दिवस राष्ट्र हमारा।
पढ़ लिख अपने अधिकार जानेगा हरजन।
जीवन मार्ग में आगे बढ़ेगा हो आनंदमग्न।

पुष्प खिलेंगे हृदय-चमन,नवीन विचारों के।
भिन्न-भिन्न सुरभित सुंदर सुखद संस्कारों के।
जीवन सागर-सा उमंग-तरंग ले होगा हरा।
उषाकाल के नभ-सा चिताकर्षक निखरा।

मन मयूर नृत्य क्रियाओं में होगा संलग्न।
आँखों में भरना चाहेगा रमणिक दृश्य जन।
निर्णय-क्षमता फलेगी चढ़ेगी चरमोत्कर्ष पर।
उचित-अनुचित का ज्ञान होगा निष्कर्ष पर।

नित नए अरमानोंं की उत्कंठा लिए चलेंगे।
फूले-चमन की जीवन परिभाषा लिए चलेंगे।
हँसें-हँसाएँ सबको,तन-मन वाणी पवित्र हो।
जो मिले खो जाए हममें ज्यों प्रिय मित्र हो।

जाति,धर्म,क्षेत्र के बंधन से मुक्त करे शिक्षा।
हृदय-सुप्त-शक्तियों को जागृत करे शिक्षा।
सूर्य-चन्द्र से चमकेंगे शिक्षा के प्रबल वेग से।
देंगे शौर्य,अमन-संदेश शिक्षा के सबल वेग से।

शिक्षा-धन अद्भुत अनुपम सुंदर और विलक्षण।
चत्तुर चुरा न सके,हृदय उज्ज्वल करे प्रतिक्षण।

राधेयश्याम “प्रीतम” कृत
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