Nov 15, 2018 · कविता
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कविता :- वो औरत एक मां है

कविता :- वो औरत एक मां है

उलझे हुए से फिरते हैं
नादिम सा एहसास लिए
दस्तबस्ता शहर में
वो नूर है
अंधेरे गुलिस्तां में ।
डरावने ख़ौफ़ के साये
हर शख्स बेगाने से
शहर भर के हंगामों में
वो कायनात है
उजड़े गुलिस्तां में ।
हाथ की लकीरें मिटती
जख्मों के निशानों से
दर्द-ए-दवा सी वो
ठंडे फव्वारे सी ।
खुदा भी झुके जिसके आगे
एक नुकरई खनक सी
फनकार है वो
जादूगरनी सी ।
आंखें भर भर आयें
जब लब कपकपायें
शबनम की बूंद वो
जन्नत की बारिश सी ।

( नादिम- लज़्ज़ित, दस्तबस्ता – बंधे हुए हाथ, नूर – ज्योति, कायनात – जन्नत, गुलिस्तां – गुलशन, नुकरई – चांदी जैसी )

— जयति जैन “नूतन” —

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जयति जैन
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लोगों की भीड़ से निकली साधारण लड़की जिसकी पहचान बेबाक और स्वतंत्र लेखन है !... View full profile
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