कविता.......मासूमों की मौत

कविता ….
*** मासूमों की मौत ***?
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100 बच्चों की जान गई है
बस लीची फल खाने से ,
गरीबी नहीं गरीब हट रहे
****** देखो इसी बहाने से ।
यही बच्चे गर होते पूंजी पतियों वालों के
संसद से ढेरों आ जाते
वादे दिल समझाने के ।।
संसद चुप है …चुप सरकारें,
क्यों गरीब की चीखों पर?
टूट गई है बाजू कितनी…
उम्मीदें पा जाने के
बिलख रही है मां बेचारी ….
ले बच्चे को गोदी में
बापू के सपने टूटे हैं घर खुशियों से जाने के ।।
संवेदनाएं मर गई हैं ????
गूंगी …बहरी सरकारों की!
नजर में चुभते रहते हैं
यह गरीब गद्दारों की ।।
***नहीं सुविधा … नहीं सुरक्षा
पड़े इलाज के लाले हैं ।
लुट गई मां की वो ममता जो
कभी पेट में पाले हैं ।।
क्या लौटेंगी खुशियां …?
उजड़ी .. उजड़ी बस्ती की!
कोई खिवैया नहीं है “सागर”,
इस टूटी अब कश्ती की ।।
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बेखौफ शायर/ गीतकार/ लेखक..
डॉ नरेश “सागर”
9897907490…..17/06/19

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