कविता · Reading time: 1 minute

“कविता नहीं आवाज हूँ,मैं एक नई कहानी,सुनाता हूँ,मैं”-ऋषि के.सी.

एक नई कहानी ,सुनाता हूँ मैं,
एक नई कहानी,सुनाता हूँ मैं,

रहता वो डूबते सागर में ,

एक नई………………..मैं ।

चिड़िया-सी कहानी है उसकी ,

उड़ता वो-फिरता जीवन की ,तालाश में,

एक नई……………….मैं।

अपने भी थे उसके ,सपने भी थे उसके,

पंखों में उड़न भरी भी उसने ,

रास्ते में चलता भी था और गिरता भी था,

बदनामी को वो चुपचाप सह जाता था ,

परन्तु सबका मान बढ़ाता था ,

एक नई………………………मैं ।

अपना खुदा भी था और उससे जुदा भी था ,

कहने से वो कतराता भी था,

और हृदय में उसको बसाता भी था,

आज भी कहानियों में ,उसको ढूंढता भी था ,

किस्मत का संदेश,मानता भी था वो उसको,

अंत में सीखा गई ,दोस्ताना उसको,

रह गई आखिरी ख़्वाइश,कहने को उसको ,

याद करता रहेगा, जीवन के पथ पर उसको ,

नही पसंद करता वो ,अफसाना उसका ,

सिर्फ सपनो में ,ढूंढ़ता था उसको ,

यही जीवन_का_सार ,बताता हूँ मैं ,

एक नई कहानी, सुनाता हूँ मैं ,

एक नई कहानी ,सुनाता हूँ मैं ।

-ऋषि के.सी.

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