कविता : जैसी करनी वैसी भरनी

सूरज ने विदाई ली,ये रात सजकर आ गई।
चाँद मुस्कराने लगा,तारों को हँसी आ गई।।

घिरके नींद जब आने लगी,आँखें सपनें सजाने लगी।
मीठे-मीठे सपने देकर,ये रात गौरी बहलाने लगी।
दु:ख के बादल सो गए,सुख की किरणें आ गई।
चाँद मुस्क़राने……………….।

सपने में हम तो स्वर्ग गए,देखकर इसको प्रसन्न हुए।
सिंह गाय संग में यहाँ तो,पानी पीने में मग्न हुए।
देखा ये नज़ारा रे,आँखें श्रद्धा से नम हुई।
चाँद मुस्क़राने………………….।

सपने में हम तो नरक गए,देखकर इसको दुखी हुए।
ना था भाईचारा कोई,लोग आपस में झगड़ रहे।
देखा ये रोना-धोना,इक दयादृष्टि बरस गई।
चाँद मुस्क़राने…………………।

सपने में अरे! यम से मिले,मिलके यही इक प्रश्न किया।
स्वर्ग-नरक में मेरे भगवन,इतना क्यों यहाँ अंतर किया?
यम बोला सुनो बेटा!है कर्मों की गति यही।
चाँद मुस्क़राने………………….।

सूरज ने विदाई ली,ये रात सजकर आ गई।
चाँद मुस्क़राने लगा,तारों को हँसी आ गई।।

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