कविता क्या है?

“कविता क्या है?”
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फूलों महकी डार-सी,तारों के नभ दरबार-सी।
दीपों के त्योहार-सी,ख़बरों के अख़बार-सी।
हर जन मन की दाद-सी,तन यौवन उन्माद-सी।
कविता तो है रूप-सी,चित हरती ये गुलज़ार-सी।

जैसे बोया पेड़ को,सींचा हरदिन ही प्यार से।
फल-फूलों से एक दिन,फूला अपने ही सार से।
घर-आँगन में आनंद,लाया नित फलकर खूब ही।
कविता तो है पेड़-सी,पर सदियों अमर निखार से।

कबीर तुलसी भाव की,मीरा घनानंद पीर की।
रैदास नानक भक्ति की,पंत निराला तासीर की।
बिहारी केशव शृंगार की,भारतेन्दु सरिस लकीर की।
कविता तो है तेज-सी,सूर्य-चन्द्र से राहगीर की।

लहरों-सी चंचल बड़ी,पर्वत-सी है अचल खड़ी।
वीरों-सी हरपल लड़ी,माला हो ज्यों मोती जड़ी।
सावन-सी करती झड़ी,नभ-सी है ऊपर ना पड़ी।
कविता तो है प्रेरणा,अल्लाहदीन की ज्यों छड़ी।

जैसे गंगा-जल लगे,ये कोई सीता फल लगे।
मनभावन-सा पल लगे,सुंदर सुरभित-सा कल लगे।
प्यारी-सी हलचल लगे,खिलता हँसता शतदल लगे।
कविता तो है प्रेम-सी,नव दुल्हन का आँचल लगे।

हरी-भरी धरती लगे,बर्फ़ मेघ से गिरती लगे।
दवा दर्द को हरती लगे,गौर देह जल तरती लगे।
आशा मन भरती लगे,संभावना निखरती लगे।
कविता तो है मूल्य-सी,हर हाल में सँवरती लगे।

आर.एस.”प्रीतम”
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