कविता *क्या तूमको वो छोड़ेंगे।*

कविता
*क्या तूमको वो छोड़ेंगे।*

जिस दुनियावाले ने ईशा मशी को नहीं छोड़ा।
क्या तूमको वो छोड़ेंगे।
तुम कितना भी अच्छा कर लो
तूमको तुमारे लोग ही तोड़ेंगें।

क्या कसूर था ईशा का की वो संसार से प्रेम करता था।
हर दीनहीन की दुःख हरता था।

कुछ धर्म के ठेकेदारों से ईशा का काम सहा न गया।
बिन बात का उन्हें सूली पर टंगवा दिया।

सूली पर न गए प्राण।
ठोकवाये उसके प्रत्येक अंग पर कील और पाषाण।

कौन गलत कौन सही हमसब जानते हुए भी चुप हो गए।
शायद इसीलिए हमने कभी मीरा तो,कभी शुक्रान्त तो ईशा मशी खोए।

पता नहीं किस जाति, किस धर्म की बात हम करते हैं।
पता नहीं हम किससे डरते हैं।

कभी सीता की अग्नि परीक्षा लेते हैं।
तो कभी सती के नाम पर स्त्री को चिता पर सजाते हैं

गिरते हुए समाज को हम क्यों नहीं संभालते हैं।
सिर्फ अपना ही सोच कर क्यों स्वार्थी हो जाते हैं।

अगर हिंदुत्व ने राम दिया तो उनके आदर्शों को क्यों नहीं अपनाते हैं।
दुसरो से जो हीन भावना रखे या हिंद के ताज को दर्शाते हैं।

तुमारे सपनों को तुमारे अपने ही कुचलेंगे।
तुमारे निकलते पंख को वो ही कुतरेंगे।।

तुमारे छलांग को कम करने के लिए तुमारे पैर भी काटेंगे।
जिस दुनियावाले ने ईशा मशी को नहीं छोड़ा।
क्या तूमको वो छोड़ेंगे।
तुम कितना भी अच्छा कर लो
तूमको तुमारे लोग ही तोड़ेंगें।

तुम दुसरो को कितना भी अपना लो
वो तुम्हें कभी नहीं अपनाएंगे
कभी रंग-रूप तो कभी धर्म-जाती से अलग कर दिखाएंगे।

तुमारे सामने वो तारीफ और पीट पीछे चुगली कर जायेंगें।
कभी जो मदद ले ली तो हर जगह ढोल पीट कर सबको बताएंगे।

हमेशा वो दुसरो का गुस्सा तुमपर ही निकालेंगें।
वो इतने खुदगर्ज होते हैं कि ,तूमको ही माफी मंगवाएंगे।

हर बार तुमपर वो ऐसी तोहमत लगाएँगे।
की आप चारों खाने चीत हो जायेंगे।

जिस दुनियावाले ने ईशा मशी को नहीं छोड़ा।
*क्या तूमको वो छोड़ेंगे।*
तुम कितना भी अच्छा कर लो
*तूमको तुमारे लोग ही तोड़ेंगें।*

*मिना कुमारी*
*रोल नो-201*
*धनबाद, झरिया*

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