लघु कथा · Reading time: 2 minutes

कल भी और आज भी

शीर्षक – कल भी और आज भी
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गाँव के रामजानकी मंदिर पर हर साल की भाति इस बार भी रामलीला का मंचन हो रहा था जिसमें अहिल्या और ऋषि गौतम का संबाद हो रहा था जो सभी का ध्यान आकर्षित किए हुए था..

“मेरे साथ छल हुआ है स्वामी, मैंने कोई पाप नहीं किया है, मै निर्दोष हूँ”

“मै कुछ भी नहीं सुनना चाहता दुष्ट स्त्री तू मेरे साथ रहने के लायक नहीं है तू अपवित्र हो गई है”

“मुझे क्षमा करदो स्वामी मै एक पतिव्रता स्त्री हूँ, मेरे साथ जिसने छल किया है दोष उसी का है.. आप उसे दंड दीजिए ”

” हे दुष्ट स्त्री तू अब पतिव्रता नहीं है मै किसी को दंड क्यों दू में तेरा चेहरा देखना नहीं चाहता…… जा तू शिला हो जा.”…….
एक पेड़ की ओट से चुनिया भी यह दृश्य देख रही थी उसकी आंखो से झर झर आंसू बह रहे थे और अपने ऊपर हुए अन्याय के एक एक दृश्य सामने आ रहे थे….. काली स्याह रात थी वह उसकी जिंदगी की, जमींदार के बेटे और उसके दोस्तों ने उसके साथ मुह काला किया… वह चीखती रही चिल्लाती रही पर किसी ने भी उसकी चीखे न सुनी
दूसरे दिन वह अपनी फरियाद लेकर पंचायत में गई लेकिन वहाँ भी उसकी एक न सुनी गई उल्टा उसे ही दोषी और कुलटा ठहराया गया और उसके मुह पर कालिख पोत कर गाँव से बाहर निकाल दिया गया….
त्रेता युग से लेकर आज कलयुग तक बदला क्या, कल भी अहिल्या थी और आज भी है कल भी उसकी चीखे किसी ने न सुनी और आज भी……
दोषी वही बनी आज भी और कल भी….

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