गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

कल के वीरान

कल के वीरान आज हो गए गुलजार ।
वक़्त कभी एक सा नहीं रहता ।।

बह जाती है बरसात में सूखी नदियां ।
कभी थम जाता है दरिया बहता ।।

गिर ही जाते हैं ये शबनम के मोती ।
सब्जा सर पर सदा नहीं सहता ।।

थक जाता है हमेशा कहने वाला ।
जिंदगी भर कोई कथा नहीं कहता ।।

टूट कर नीचे गिरेंगे यह भी ।
पेड़ भी अपने फल नहीं गहता ।।

चिंता करने से हल नहीं होता ।
सुधि इस आग में नहीं दहता ।।

जड़ें हो जिस दरख़्त की गहरी ।
झंझा – वातों में वह नहीं ढहता ।।

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