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"कल्पित जीवन "

वह कल्पित जीवन कितना सुंदर ,
नहीं जहाँ पर तम अन्तर्मन में ,
पीडा भी रह -रह कर जहाँ,
आती जाती रहती हो ,
जीवन में सुख-दु:ख दोनों का,
सखियों की भाँति मिलन हो ,
आशायी घटा जहाँ दूर-दूर तक,
मन में नूतन- हर्ष संचार करे,
व्यथित ,थकित मन शान्त रहे,
मुख से वेदना की आह न हो,
निर्मल, निश्छल, अंतरघट,
कलुष भेद का भाव न हो ,
नवचेतना ……………नववर्ष ,
नवकामना……….… नवहर्ष,
आकुल मन को शान्त करे|

…निधि…

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डा0 निधि श्रीवास्तव
डा0 निधि श्रीवास्तव "सरोद"
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"हूँ सरल ,किंतु सरल नहीं जान लेना मुझको, हूँ एक धारा-अविरल,किंतु रोक लेना मुझको"
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