कल्पना

ऐ कवि-शायर! कहाँ तुम छिप कर बैठे हो.
ज़रा बाहर निकल कर देख तेरी कल्पना है क्या.
कहाँ निर्भीक वह यौवन, जिसे तुम शोख कहते हो.
कहाँ जलता हुआ सौन्दर्य, जिसको ज्योति कहते हो .
कहाँ कंचनमयी काया, कहाँ है जुल्फ बादल सा.
किधर चन्दन सा है वह तन, कहाँ है नैन काजल सा.
हाँ देखा है सड़क पर शर्म से झुकती जवानी को,
सुना कोठे की मैली सेज पर लुटती जवानी को.
इसी मजबूर यौवन पर लगाकर शब्द का पर्दा,
सच्चाई को छिपाने का तेरा यह बचपना है क्या.
ज़रा बाहर निकल कर देख तेरी कल्पना है क्या.
फटें हों बसन जिस तन के, उसे ढंकना बताना क्या.
जो घूँघट लुट चुका उसको, भला पर्दा सिखाना क्या.
करती भूख की खातिर, जो अपने रूप का सौदा.
उस मजबूर बाला को भी, शहनाई सुनाना क्या.
यहाँ पर रहनुमा तन पर धवल खद्दर पहनते हैं,
मगर कुरते के नीचे अपनी गंजी मैली रखतें हैं.
अगर मन साफ़ ही ना हो तो फिर संगम नहाना क्या.
ज़रा बाहर निकल कर देख तेरी कल्पना है क्या.
फिजा बदली- घटा बदली, ज़मीं बदली- जहां बदला.
हवा ऐसी चली इंसान का, दिल और इमां बदला.
खुदा- भगवान् का अब फैसला, इंसान करता है.
यहाँ मंदिर- वहाँ मस्जिद, इसी मुद्दे पर लड़ता है.
जिस मुल्क में निर्धन- दलित अपमान सहते हैं,
जहां खुनी- लुटेरा शान से सरेआम रहते हैं.
मापतपुरी तन्हाई में ये सोच कर देखो,
यही इकबाल के सपनों का वो हिन्दोस्तां है क्या.
ज़रा बाहर निकल कर देख तेरी कल्पना है क्या.

——- सतीश मापतपुरी

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