कविता · Reading time: 1 minute

कलरव

कलरव

पक्षियों का कलरव
भा रहा हैं मन को
हवा की सांय-सांय
है बहुत कर्णप्रिय
इनके राग
नहीं हैं किसी
वाद से प्रेरित
नहीं हैं
साम्प्रदायिक
नहीं हैं
जातिवादी
हैं विशुध्द प्राकृतिक
आज की विकट
परिस्थितियों में भी

-विनोद सिल्ला

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