गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

कलम का वार तीखा हो

डुबोने नाव भारत की कई गद्दार बैठे हैं
मिटाने राष्ट्र गरिमा को लिए हथियार बैठे हैं।

रगो में खून खोले देख कर भद्दे इरादों को
भगाने दुश्मनों को देश से, तैयार बैठे हैं।

नमक खा कर हमारा, साथ गैरों का निभाते वो
जुबां को कुंद कर डालो, बने दमदार बैठे हैं।

कलम का वार तीखा हो, मरें लज्जा उन्हें आये
धरे अब हाथ पर यूँ हाथ, क्यों हम यार बैठे हैं।

कुचल कर विष-विषैलों का, उन्हें दूरी कहो कर लें
कभी मुड़कर इधर देखें न, खाये खार बैठे हैं।

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