कर्म

होनी तो होकर रहे, मत कर व्यर्थ विचार।
कर्म पंथ पर बढ़ चलो, यह जीवन का सार।। १

दिल में मानवता रखें, होठों पर मुस्कान।
बिना स्वार्थ तू कर्म कर, फल देगा भगवान।। २

बुरे कर्म के द्वार पर, आता संकट रोज।
जो सबका अच्छा करे, लेता खुशियाँ खोज।।३

कर्म हीन बन सोचना, बहुत बड़ा है पाप।
तन मन दोनों को रखें, सत्कर्मो में आप।। ४

सतत कर्म करते रहो, जीवन का वरदान।
किये हुए शुभ कर्म से, मिलता है सम्मान।।५

सबसे उत्तम कर्म वह, दे सबको आनंद।
ऐसे ही इंसान को, करते देव पसंद।।६

जैसे कठपुतली नाचता, नट के दोनों हाथ।
वैसे ही नाचे मनुज, सदा कर्म के साथ।।७

श्रद्धा से जो भी किया, बहुत श्रेष्ठ वह कर्म ।
सदा करो उपकार तुम , बहुत बड़ा ये धर्म।।८

सत्य कर्म विश्वास से, जीवन हो खुशहाल ।
नित्य नियम से कर्म कर, नहीं काम को टाल।।९

कर्म हीन बनता मनुज, केवल मृतक समान।
करते अच्छे कर्म जो, बढता उसका मान।।१ ०

भाग्य कर्म की तूलिका, जिसमें भरती रंग।
सजे सुरों से जिन्दगी, बड़ा अनोखा ढंग।।१ १

कलयुग में सबसे बड़ा, है मानव का कर्म।
कर्म करे किस्मत बने, जीवन का यह मर्म।।१ २

मानव कहलाये मगर, भूले मानव धर्म।
दुर्लभ मानव देह से, किया नहीं शुभ कर्म।।१३

कर्मों से इंसान की, होती है पहचान।
वरना महँगे वस्त्र में, पुतले खड़े दुकान।। १४

—लक्ष्मी सिंह

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