कविता · Reading time: 1 minute

करना होगा विश्वास

कई अजूबे इस दुनिया में तुम मानो या न मानो
हर शह परखी नहीं है जाती इशारों में ही पहचानो।

घड़ी की सुई है समय को चलाती कभी समय को न देखा
मानव की इक इक सांसों का समय को है लेखा-जोखा ।
उस अद्भुत अप्रतिम सत्ता के विपुल रूप को पहचानो
कई अजूबे इस दुनिया में तुम मानो या न मानो।

बालक माँ की कोख से जन्मा शनैः-शनैः वह बढ़ने लगा
समय बीतते आया बुढ़ापा अंत की कथा को गढ़ने लगा।
यही नियति है जीवन की रे मानव मन पहचानो
कई अजूबे इस दुनिया में तुम मानो या न मानो।

भले का अंत भला होता है और बुरे का अंत बुरा
बदले में तुम्हें शूल मिलेंगे यदि घोंपा है तुमने छुरा।
एक भलाई के फल सौ- सौ देता प्रभु है इंसानों
कई अजूबे इस दुनिया में तुम मानो या न मानो।

रंजना माथुर
अजमेर (राजस्थान )
मेरी स्व रचित व मौलिक रचना
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