गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

कमबख़्त मोहब्बत

बड़ी कमबख़्त मोहब्बत है
कभी अपनों सी लगती है
कभी सपनों सी लगती है
कभी पागल दीवानी सी
कभी बिखरी कहानी सी
अभी कुछ और है लिखना
अगर थोड़ी इजाज़त है
बड़ी कमबख़्त मोहब्बत है
कभी गुमनाम सा किस्सा
किसी दिल का नया हिस्सा
कभी लगती है अन्जानी
कभी बिखरी कहानी सी
सभी गुजरे हुए लम्हें
यहाँ सब कुछ सलामत है
बड़ी कमबख़्त मोहब्बत है
कभी बचपन की यादों में
कभी दादी की बातों में
मोहब्बत तो मोहब्बत है
मोहब्बत एक इबादत है
बदल सब कुछ दिया इसने
अलग सा गम दिया इसने
मगर अब क्या करे ज़ाना*
नहीं कोई शिकायत है
बड़ी कमबख़्त मोहब्बत है
(*ज़ाना ~ एक नाम )

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