गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

कमल केतकी गुलाब या गुलबहार हो तुम

कमल केतकी गुलाब या गुलबहार हो तुम
सावन आये झूम के वो मल्हार हो तुम

रोशनी से धुला दिन तारों से सजी रात
मेरे लिये ईश्वर का पुरस्कार हो तुम

नाज़- ओ- अंदाज़ हैं नये नये ख़्याल तिरे
दौर-ए-आज में मिरे दिल की पुकार हो तुम

दिल में खुशी हो ज़्यादा या ग़मगीन बहुत
उन पलों की हर ज़रूरत में शुमार हो तुम

शायद तुम्हें मालूम न हो मुस्कान मिरी
पुराने खंडहर में फूलों का संसार हो तुम

ऐसा नहीं है हरगिज़ तिरी बात बात है
दिल थाम के सुनूं ऐसा समाचार हो तुम

तिरी मासूमियत में पाया देर- ओ -हरम
तो जाना ‘सरु’ ने खुदा का दीदार हो तुम

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