लघु कथा · Reading time: 2 minutes

कमरा नं० ५२

कमरा नंबर बयालीस
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बारहवीं के छात्र डेविड ने अभी-अभी एक बड़े शहर के नामी संस्थान में अपना दाखिला लिया था। उसे अभी क्लास जाते कुछ ही दिन हुए थे कि उसके पड़ोस ही में रहनेवाली बेहद मासूम और उतनी ही सुंदर दिखनेवाली एक लड़की से परिचय हुआ ज़िसका नाम था मोना। उम्र में शायद डेविड से एकाध साल की छोटी या हमउम्र की ही हो लेकिन इलाके की सारी लड़कियों में से सबसे खूबसूरत लड़की थी मोना। थोड़ी ही जान-पहचान में अब डेविड उसके साथ रोज आने-जाने लगा था।बहुत ही जल्द दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई….और जल्द ही ये दोस्ती प्यार में बदल गयी। कुछ भी करने को तैयार डेविड मोना को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता था…।उसके प्यार के जुनुन में दीवाना हो चुका डेविड उसे खुश रखने के लिए हर दफा मोना को कभी मुँगफली तो कभी अाईसक्रीम तो कभी काॅफी और न जाने क्या क्या खिला पिलाकर नित नये खर्च करने लगा था। मंहगे तोहफे देने की जुगत में जब उसका बजट खराब होने लगा तो उसने अपने पढ़ाई के खर्च की कटौती करने की सोची।हर हमेशा मोना को खुश देखने की चाहत में सैर-सपाटा और उस पर कभी मंहगे रेस्टाॅरेन्ट में डिनर तो कभी लंच कराने लगा था और यही जुनुन उसे अपने लक्ष्य से भटका चुका था।अब उसका सारा ध्यान मोना पर ही रहता। हर रोज बढ़ती मोना की फरमाईशों ने उसको शहर के एक नामचीन होटेल में पार्ट-टाईम जाॅब करने पर मजबूर कर दिया था, शायद आए दिन बढ़ते मोना के शौक और पढ़ाई के खर्च को पूरा करने का ये ही एक आसान हल था। किस्मत से डेविड को देर रात की नाईट शिफ्ट में वेटर का काम भी मिल गया। एक दिन होटल मालिक ने होटल के 42 नम्बर वाले बेहद वी आई पी और प्राईवेट लक्ज़ूरियश कमरे में, जो हमेशा अपने खास मेहमानों(ग्राहकों) के लिए एय्याशी के लिये रिजर्व रखता था उसमें पिज्जा और कोल्ड ड्रिंक्स सर्व करने को भेजा। डेविड ने बयालीस नंबर कमरे का डोरबेल बजाया..दरवाजा खुलते ही डेविड के पैरों तले ज़मीन खिसक गयी…क्योंकि बिस्तर पर किसी रंगीन मिजाजी और हवस के शौकीन व्यक्ति के साथ अधनंगी पड़ी बड़ी ही अदा से मुस्करा रही वो पेशेवर लड़की कोई और नही….उसी की मोना थी….जिसके लिए आज वो वेटर तक बन चुका था।

राहुल कुमार विद्यार्थी
तारापुर (बिहार)

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