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कद्र।

Apr 26, 2020 01:14 AM

ना इतराइये ये सोच कर,
कि आपके लिए भी कोई मचल सकता है,
कद्र का मोहताज हर कोई है यहां,
कि इंसान कभी भी बदल सकता है,

कलयुग की इस दुनिया में,
पत्थर भी पिघल सकता है,
यही तो ख़ासियत-ए-ज़िंदगी है दोस्त,
कि इंसान खुद भी गिर के संभल सकता है

-अंबर श्रीवास्तव

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Amber Srivastava
Amber Srivastava
Bareilly,(UP)
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लहजा कितना ही साफ हो लेकिन, बदलहज़ी न दिखने पाए, अल्फ़ाज़ों के दौर चलते रहें,...
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