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कभी परिमापित नहीं

कभी परिमापित नहीं
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आसमाँ को गर्व है, तारकों की माप पर;
एक चंदा है मेरा, कभी परिमापित नहीं।

क्या कहोगे बादलों के
चक्रवाती दाँव से?
ओ गगन तुम स्वयं
परिमाप के विस्तार हो;
तारकों की नाल में
गह्वर बनाओगे कहो,
तुम मनोहर दृश्य के
स्वयं ही आगार हो।

बादलों को गर्व है, आयतों की छाँव पर;
छाँव मेरी रूह की, कभी परिमापित नहीं।

चाँदनी का त्याग कर,
क्या रह सकोगे चंद्रमा?
तुम स्वयं ही चाँदनी के
सन्निहित से भाग हो;
दैव को मंजूर थी
स्याह सी गहरी निशा,
चाँदनी की लालिमा का
क्यों किसी को ज्ञान हो?

चंद्रमा को गर्व है, चाँदनी से मेल पर;
चाँदनी मेरी रही, कभी परिमापित नहीं।
…“निश्छल”

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अमित निश्छल
अमित निश्छल
देवरिया
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हिंदी में उन्मुक्त लेखन...