Oct 29, 2020 · कविता
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कभी नींद लेते हैं

ये रात के दामन में छिटके अंधेरे
कभी नींद देते हैं कभी नींद लेते हैं
कभी पलकों पे
कच्चे पक्के से ख़वाब बुनते हैं

ये रात के दामन में छिटके अंधेरे
कभी चुप रहते हैं
कभी सांसों को सुनते हैं
सब के हिस्से के अंधेरे उजाले को गिनते है

ये रात के दामन में छिटके अंधेरे
चांद और सितारों के नीबाले गिनते हैं
जुगनूओं के परों के छाले गिनते हैं
सपनो के पैरों के छाले चुनते हैं
अपनों के नयनों के उबाले गिनते है
ये अंधेरे जाने क्या क्या करते हैं
~ सिद्धार्थ

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Mugdha shiddharth
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मुझे लिखना और पढ़ना बेहद पसंद है ; तो क्यूँ न कुछ अलग किया जाय...... View full profile
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