कविता · Reading time: 1 minute

कभी तो…..

कभी तो हंसाया होता तुमने
कभी तो रुलाया होता तुमने
कभी तो झगड़ा किया होता तुमसे
कभी तो गिला शिकवा किया होता तुमसे
मुझे तो कोई शिकवा नही तुमसे
मुझे तो कोई शिकायत भी नही तुमसे।
कभी तो दूर किया होता तुमने
कभी तो पास बुलाया होता तुमने
कभी तो करीब समझा होता तुमने
कभी तो कुछ मान दिया होता तुमने
मुझे तो कोई शिकवा नही तुमसे
मुझे तो कोई शिकायत भी नही तुमसे।
कभी अपना ही नही समझा तुमने
कभी बेगाना भी नही किया तुमने
कभी कुछ बताया भी नही तुमने
कभी कुछ समझा ही नही तुमने
मुझे तो कोई शिकवा नही तुमसे
मुझे तो कोई शिकायत भी नही तुमसे।
“मंजु को कोई गिला नही तुमसे”
डॉ मंजु सैनी
गाजियाबाद

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