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कभी तनिक जो सोचूँ मैं

शिवम राव मणि

शिवम राव मणि

शेर

November 10, 2017

कभी तनिक जो सोचूँ मैं, ये जख़्म-ए-हालात कैसी है?
छवि में लिपटे ये घात कैसी है?

सहज अलफाज़ भी है और संभली आवाज भी
आज मैं भी हूँ सामने, तो ये नज़रे खाती मात कैसी है?

ईंतजार हुआ इतना, कि सुनने को हम भी बेबस
सोचा था कहावत आगे बढ़े, तो ये थमी बात कैसी है?

सहन भी इस हद है, कि रहम भी तुम्हारा है
वरना तो साँसे पहले भी मौजूद थी, तो ये मिली हयात कैसी है?

सिमटूँ या सहरा-सा दिखूँ, तो हूँ मैं
एक अजनबी-सा अगर दिखा, तो ये मुलाकात कैसी है?

चाहत है बन्धन की, तुम्हारे साथ हरदम
चाहें तो लोग ये कह दें, तो ये सैरात कैसी है?
– शिवम राव मणि

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