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कभी जिन्दगी में उजाले न होते

बसंत कुमार शर्मा

बसंत कुमार शर्मा

गज़ल/गीतिका

October 6, 2016

कभी जिन्दगी में उजाले न होते
अगर आप हमको सँभाले न होते

नहीं ढूंढ पाते कभी प्यार को हम
अगर चिठ्ठियों को खँगाले न होते

हटाते अगर तुम जरा ये दुपट्टा
हमारी जुबां पर भी ताले न होते

टहलते न गम ही न खुशियाँ थिरकती
अगर महफिलों में पियाले न होते

सभी कुछ जहां में हमें साफ़ दिखता
अगर मोह के दिल पे’ जाले न होते

हमारा ये’ दिल बैठ जाता कभी का
अगर दर्द दिल से निकाले न होते

न होता समंदर कभी इतना’ खारा
ये आंसू समंदर में डाले न होते

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Author
बसंत कुमार शर्मा
भारतीय रेल यातायात सेवा (IRTS) में , जबलपुर, पश्चिम मध्य रेल पर उप मुख्य परिचालन प्रबंधक के पद पर कार्यरत, गीत, गजल/गीतिका, दोहे, लघुकथा एवं व्यंग्य लेखन
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