Skip to content

कभी कभी मेरे दिल मे…।

विनोद सिन्हा

विनोद सिन्हा "सुदामा"

कविता

December 23, 2016

कभी कभी…।

कभी कभी मेरे दिल मे खयाल आता है..।।
कि जिंदगी इतनी वीरान नही होती,
गर तू मेरे साथ होती तू मेरे पास होती…।

कभी मै तुझे सहेजता..
कभी तुझे थोड़ा समेटता…।
रहती तू बनकर मेरी हरपल और….
रखता तुझे अपने आगोश मे हरदम.।
हाँ तुम होती तो जिंदगी कुछ और होती..।

मगर ऐसा हो न सका…।

मगर ऐसा हो न सका…
तू मुझसे उतनी हीं दूर भागती रही,
जितना मै तेरे पीछे भागता रहा…।
तू उतने ही तेजी से निकलती गई,
जितना तुझे मै सहेजता रहा..।

कभी कभी…..

कभी कभी मेरे दिल मे ये खयाल आता है..।

कि यें आँखें भी चैन की निंद सो पाती,
अगर इनमे तेरे ख्वाब न पलतें….।
तू मेरे साथ चलती, मै तेरे साथ चलता…।
कभी तुम मेरे किताबों मे होती तो,
कभी तकिया बन मेरे कमरे मे मेरे साथ होती….।

मगर ऐसा हो न सका..।

मगर ऐसा हो न सका..,
तू कभी मेरी हो न सकी,
तुझको पाने के मेरे ख्वाब सिर्फ,
एक ख्वाब बन कर रह गयें…..।

कभी कभी…मगर,

आज फिर आई हो तुम एक नई ख्वाब बनकर,
नये रुप नये रंग मे सज धजकर कर,
एक नयी योवना सा रूप लेकर…।

अब आ हीं गई हो तुम जब..
नई गुलाबी रंगों मे रंगकर…।
तुझको पाने की तमन्ना फिर से..
दिल मे जाग उठी है….।

अगर हो जाए ऐसा और तू हो जाए मेरी,
तो फिर से अपने ख्वाबों मे मै भी नये रंग भर लूं..।

कर लूं पुरे उन सारे अधूरे ख्वाबों को,
जो तेरे बिना पुरे ना कर सका..।
जी लूँ हर उन ख्वाहिशों को फिर से.।
जो तेरे रहते पहले जी न सका…।

कभी कभी …

कभी कभी मेरे दिल मे ख्याल आता है .।

तू होती तो क्या क्या होता…?

हाँ यही सोचता हूँ हरपल…।

तू होती तो मिटाता भूख उन बच्चों का,
जो भुखे प्यासे दो निवाले के लिए तरसती आँखो से,
इंतजार करते रहतें है हरपल घर के चौमुहाने पर…।

ले आता कुछ फल और दवाईयाँ मै बूढे माँ-बाप के
लिए जों इस उम्र मे सिर्फ उनपर पर हीं हैं निर्भर हैं…।

खरीदता हर कोरे सपनों को गृहनी के,
और पुरी करता उसके हर उन ख्वाहिशों को,
जो अधूरी अधूरी सी रहती है…
फिर भी मूह से कुछ नही कहती…।

कभी कभी…,

मेरे दिल मे ये ख्याल आता है.
मगर फिर सोचता हूँ..?

कि तू तो ठहरी एक मृगतृष्णा तू कहाँ किसी की हो पाई है…?
कल तक जो थी तू हजार-पाँच सौ के रूप मे,
आज दो हजार बन कर सामने आई है…।

हाँ आज दो हजार बन कर तू सामने आई है.।

मगर फिर भी कभी कभी मेरे दिल मे ख्याल आता है…,
तू अगर मेरी होती तो जिंदगी कुछ और होती..।

शायद बड़ी हसीन होती.।

शायद बड़ी हसीन होती.।

विनोद सिन्हा- “सुदामा”

Recommended
ये माना घिरी हर तरफ तीरगी है
ये माना घिरी हर तरफ तीरगी है मगर छन भी आती कहीं रोशनी है न करती लबों से वो शिकवा शिकायत मगर बात नज़रों से... Read more
आहिस्ता आहिस्ता!
वो कड़कती धूप, वो घना कोहरा, वो घनघोर बारिश, और आयी बसंत बहार जिंदगी के सारे ऋतू तेरे अहसासात को समेटे तुझे पहलुओं में लपेटे... Read more
क्यू नही!
रो कर मुश्कुराते क्यू नही रूठ कर मनाते क्यू नही अपनों को रिझाते क्यू नही प्यार से सँवरते क्यू नही देख कर शर्माते क्यू नही... Read more
Author
विनोद सिन्हा
मैं गया (बिहार) का निवासी हूँ । रसायन शास्त्र से मैने स्नातक किया है.। बहुरंगी जिन्दगी के कुछ रंगों को समेटकर टूटे-फूटे शब्दों में सहेजता हूँ वही लिखता हूँ। मै कविता/ग़ज़ल/शेर/आदि विधाओं में लिखता हूँ ।