!!!! कब होगा फैसला मेरा हक़ में !!!!

सुबह से हो गयी शाम
इक आस को लेकर बैठे हुए
न जाने कितने साल गुजर गए
कचहेरी में खुद को लाते हुए
न भूख की चिंता
न रहती प्यास की
लगी रहती है टकटकी
शायद सुनाने को जज की पुकार
क्या अरमान सुबह लेकर
मन में आ जाता हूँ
शाम ढलते ही
खुद बहुत मायूस पाता हूँ
घर जाऊँगा तो
सब की नजर उठती है मुझ पर
खाली मन को लेकर
फिर बैठ जाता हूँ , की शायद
फैसला मिल जाये अगली तारीख पर
खो चूका हूँ खुद को
और गुजर चुकी हैं सब तमन्नाये
किस मोड़ पर ले आयी जिन्दगी
अब कैसे घर अपना चलायें
माँ, पत्नी, बच्चों कि पुकार
शायद पापा ले आये आजा सारा गुलजार
पर किस को बताऊँ , कि
मेरा कैसे
उजड़ रहा धीरे धीरे संसार
बहुत लाचार मेरा अब संसार
शायद देखने को, कल की नई
तारीख पर ,
बूढी आँखें भी अब थकने लगी
शायद ही मिले इस जनम में मुझ को
खोया हुआ अपना संसार….
शायद ही मिले घर द्वार को
फिर से सजाने के लिए
जज की पुकार मेरे नाम
जो खिला दे खुशियन में खोये हुए
चमन में……

अजीत कुमार तलवार
मेरठ

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