Oct 15, 2016 · कविता

कब सावन आवे

धूप सुनहरी चलती रहती,
वक्त का दामन थामे |
पर्वत नदियाँ सब सहमे से,
कहते है कब सावन आवे ||
पतझड़ छाया है मन में,
मुस्कान भी धूमिल होती जाती |
जर्जर लम्हे होकर घायल,
कहते है कब सावन आवे ||
एक बूँद पड़ी जब मिटटी पर,
उड़ी महक इस दिल तक |
पल में जीवन झूम उडा,
रहा न ख़ामोशी का पहरा ||
अब रिमझिम वारिश,
धूमिल पत्तो को नहला कर |
पर्वत को सहला कर,
चली झूमती इस दिल को बहला कर ||
– सोनिका मिश्रा

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मेरे शब्द एक प्रहार हैं, न कोई जीत न कोई हार हैं | डूब गए...
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