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कब तक

शालिनी सिंह

शालिनी सिंह

कविता

January 27, 2017

कभी सती बना चिता में जला दिया

कभी जौहर के कुंड मे कूदा दिया

छीन ली साँसें कोख में ही कभी

कभी आँख खुलते ही सुला दिया

छीनकर नन्हें हाथों से क़लम कभी

ज़िम्मेदारी की हिना से सजा दिया

कटौती की उसके हिस्से के दूध की कभी

कभी रोटी के ख़ातिर बाज़ार में बेच दिया

पराया बता विदा किया कभी डोली में बिठा

कभी भस्म किया दहेज की आग में जला

सम्मान की रक्षा कह बलि कभी दे दी उसकी

जो हर बरस कलाई पे राखी बाँधी थी कभी

गुण ताक पे रख सभी ,सुंदरता पे आँका उसे

अंह के तेज़ाब से चेहरा जला डाला कभी

इसमत लूटी कभी हवस के गलियारों में

कभी रूह उसकी रोंदी बंद दरवाज़ों में

स्वार्थ को प्रेम बता कभी विवेक उसका हर लिया

दोष अपनी अनैतिकता का भी सिर उसके मढ़ दिया

देवी कह माँग लिया कभी उससे बलिदान

कभी अबला समझ कर दिया उसका अपमान

पूजने लगे कभी उसे शक्ति बता मंदिर में

कभी निषेध कर दिये उसके क़दम भी देवालय में

समाज के पक्षपात की बेड़ी कभी खोली उसने

तुरंत परम्परा का चाबुक उसपे तुमने चला दिया

आख़िर कब तक करोगे उसका दमन तुम

कभी तो कुंठा – मुक्त कर अपने ज़ेहन को

कहो उससे –

देखो! तुम्हारी परवाज़ को मैंने सवछंद आसमान दिया!

Author
शालिनी सिंह
I am doctor by profession. I love poetry in all its form. I believe poetry is the boldest and most honest form of writing. I write in Hindi, Urdu and English .
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