गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

कफ्न की कीमत चुकानी रह गयी

कर्ज वो सारा चुकाकर मर गया
कफ्न की कीमत चुकानी रह गयी

कर के वादा आज भी आये न वो
बस महकती रातरानी रह गयी

कर ही डाली मैंने सारी कोशिशें
बस लकीरों से निभानी रह गयी

प्यार का होने लगा सौदा है अब
दिल की बस कीमत लगानी रह गयी

खो गयी इंसान की पहचान अब
टोपियाँ, माला निशानी रह गयी

पेट पर पत्थर रखा था अब तलक
रात सड़कों पर बितानी रह गयी

मिल ही जायेगा तुम्हें तुम सा कोई
बात ये तुमको बतानी रह गयी

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