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कपकपाती थरथराती ये सज़ा क्यों है?

Neeraj Chauhan

Neeraj Chauhan

कविता

December 9, 2016

कपकपाती थरथराती ये सज़ा क्यों है
फिर भी ठंड का इतना मज़ा क्यों है?

ये सिहरन, ये ठिठुरन ये गरमाई क्यों है
देर से उठने की अंगडाई क्यों है
किसी के हाथो मे इतनी नरमाई क्यों है?

हर पल ठंड का वो वहम क्यों है
उस पर चाय का इतना रहम क्यों है?

किसी के आने की आहट क्यों है
ठिठुरते होठों पे मुस्कुराहट क्यों है?

ये हवाएं कहर बरपाती क्यों है
ये धूप अब हमसे शरमाती क्यों है?

किसी का चहकता हुआ सवेरा क्यों है
रात मे सिसकता वो “बसेरा” क्यों है?

– नीरज चौहान की कलम से…

Author
Neeraj Chauhan
कॉर्पोरेट और हिंदी की जगज़ाहिर लड़ाई में एक छुपा हुआ लेखक हूँ। माँ हिंदी के प्रति मेरी गहरी निष्ठा हैं। जिसे आजीवन मैं निभाना चाहता हूँ।
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