Jan 25, 2017 · कविता

कन्या भ्रूण (मैं तुम्हारा ही अंश हूँ )

क्या मेरी मौजूदगी का अहसास है तुम्हें
क्या मेरे अस्तित्व काआभास है तुम्हें
क्या मेरी धङकनौं से जुङे है तुम्हारे दिल के तार
क्या मेरी साँसों से धङकते है तुम्हारे अहसास।
क्या तुमने कभी सींचा है मुझे भावनाओ से
क्या तुमने कभी देखा है मुझे प्यार से।
फिर क्यों बेचैंनी है कि गर्भ में क्या है
पुत्र का आगमन है या पुत्री का भार पङा है।
है बेटी,सुनकर क्यों सन्न रह गये
क्यों आँखें लाल हुयी,माथे पर बल पङ गये।
बेटा ,बस बेटा,बस बेटे की चाह में
जाने कितनी कन्या मार दी तुमने भ्रूण में।
बेटा वंश बङाता है, बेटा बुङापे का सहारा है
बेटे के विवाह के लिये धन की जरूरत नहीं होती।
बेटा अगर भग जाये तो जिल्लत नहीं मिलती।
क्या कोई लङकी नही बनी सीता, लळमीबाई,इंदिरा । क्या हर लङका राम,लच्छमण,.श्रवनकुमार,हुआ।
क्या कोई लड़का कंस रावण या दुशासन न हुआ।
फिर क्यों अनदेखे अनजान भविष्य से
मारङाला तुमने मुझे जन्म से पहले।
मैं मचल रही थी माँ के प्यार को
मैं बटोरना चाहती थी सबके दुलार को।
क्या मेरे शरीर में चेतना नही हैं
या फिर मुझमें दिल दिमाग, संवेदना नहीं है।
या फिर मेरी रगों में तुम्हारा खून नहीं दौङता
या फिर मेरे एक दर्द से तुम्हारा खून नहीं खौलता।
या फिर हो गये हैं तुम्हारे पाषाण के दिल
य़ा फिर लहु में पानी गया है मिल।
तो फिर क्यों घबरा रहे हो अपनी जिम्मेदारीयों से
और क्यों कतरा रहे हो अपने कर्तव्यों से।
आने दो मुझे इस धरती पे
जीने दो मुझे,मिले हैं जितने पल जिन्दगी के।
मैं तुम्हारा ही अंश हूँ,मुझमें भी जीवन है
जितना तुम्हें है, जीने का हक उतना मुझेभी है।
**” पारुल शर्मा “**

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