कन्टाप !

कन्टाप !
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-अंकल जी नमस्ते !
-क्या बात है पप्पू ! बड़े बुझे-बुझे से लग रहे हो !
-कुछ नहीं अंकल जी ! कल रात मैं घर से भाग गया था ।
-क्या बात हो गयी थी ?
-कुछ नहीं बस ! पापा से हो गयी थी ।
-ऐसा नहीं करते बेटा ! माँ –बाप अपने बच्चों का हमेशा भला ही सोचते हैं।
-सोचने वाली बात नहीं है अंकल ! बहुत डांटा उन्होंने मुझे ! बहुत समझा रहे थे ! बहुत गुस्सा पिया मैंने ! पापा हैं, तभी तो मैं भाग गया ! कोई और होता तो पक्का खाता मेरे हाथ से – “कन्टाप” !
….. अपना कान खुजलाते हुए अंकल जी चुपके से वहां से खिसक लिये ।
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***हरीश*चन्द्र*लोहुमी***
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कविता क्या होती है, नहीं जानता हूँ । कुछ लिखने की चेष्टा करता हूँ तो...
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