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“कतरा कतरा पिघली हूँ”

Dr.rajni Agrawal

Dr.rajni Agrawal

गज़ल/गीतिका

June 15, 2017

“कतरा कतरा पिघली हूँ”(2×15)
यादों की जलती लाशों पर मैंने हर इक सर्द लिखा
कतरा-कतरा पिघली हूँ तब जाकर मैंने दर्द लिखा।

आँखों से बरसा कर सावन कितने सागर खार किए
अश्कों से भीगा क़ागज़ तब पीड़ा को हमदर्द लिखा।

अरमानों की बलिवेदी पर अहसासों की भेंट चढ़ी
तड़प गया हर रोआँ तन का मैंने दहशतगर्द लिखा।

यादें तेरी दिल में अपने कितने पतझड़ पाली हैं
शाखा से जब पत्र गिरा तब जाकर मैंने ज़र्द लिखा।

खेली होली जज़्बातों से लाल लहू का घूँट पिला
दीप जलाया जिसने घर में उसको सच्चा मर्द लिखा।

तोड़ सका ना पत्थर दिल तू शीशे जैसा मन मेरा
आज वफ़ा की कश्ती चढ़ “रजनी” ने खुद को बर्द लिखा।

डॉ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”
संपादिका-साहित्य धरोहर
महमूरगंज, वाराणसी (मो.- 9839664017)

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Author
Dr.rajni Agrawal
 अध्यापन कार्यरत, आकाशवाणी व दूरदर्शन की अप्रूव्ड स्क्रिप्ट राइटर , निर्देशिका, अभिनेत्री,कवयित्री, संपादिका समाज -सेविका। उपलब्धियाँ- राज्य स्तर पर ओम शिव पुरी द्वारा सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार, काव्य- मंच पर "ज्ञान भास्कार" सम्मान, "काव्य -रत्न" सम्मान", "काव्य मार्तंड" सम्मान, "पंच रत्न"... Read more

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