कविता · Reading time: 1 minute

“कटु सत्य”

जीवन के कटु सत्यों ने बहुत तड़पाया है….
सोचती हूँ तो रूह काँप सी जाती है…
सांसें सीने में घुट जाती है…
जब भी याद आतें हैं वो पल बीते हुए…
चारों ओर सऩ्नाटे पसर जाते हैं…
कितना दर्द कितनी घुटन…
दिल में बेबस अरमान कसक जाते हैं …
जीवनयापन को मजबूर जिंदगी…
टीसते जख्म सी रिस रही है…
कभी बुझती कभी जलती पेट की आग करूण सिसक रही है…
थक गया है जिस्म “दोहरी जिंदगी”
जीते जीते ..
.तन्हा अश्क पीते पीते …
अपनों के बोझिल चेहरों की मुस्कुराहटें मैं कैसे वापिस लाऊँ …तूही बता जिंदगी…
किस तरह मैं उनका सुख लौटाऊँ….?

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