कटता जंगल

कविता
( बेटियों पर )
रचना स्वरचित एवं मौलिक है

कटता जंगल

जानती हूँ माँ
तुम तक पहुंच चुकी है
खबर मेरे आने की
मगर माँ , मत कर चिंता
न हो दुखी
दे दे मोहलत मुझे भी
गर्भ में पलने की
रहने दे छाँव तले आँचल की
सींच मुझे भी दूध से अपने
फिर देखना यही दूध
दौड़ेगा बनकर लहू
रगों में मेरे
करूंगी रौशन कोख़ को तेरी
जानती हूँ माँ
सुनकर खबर मेरे आने की
होंगी दादी दुखी
दाई को देने, निकाला सौ का नोट
बुझे मन से रख लेंगी वापस
अंगिया में अपने
दादा का बुढ़ापा
कुछ और गहरा जायेगा
पापा को सताने लगेगी फिक्र
दहेज़ की मेरे
मगर तू न होना निराश
न करना चिंता
एक दिन रचूँगी मैं ही
नया इतिहास
किरण बेदी
कल्पना चावला
सानिया मिर्जा की तरह
गर्व करेंगे वे ही बेटियों पर
जो काट रहे हैं
आज जंगल बेटियों का
होगा एहसास कि
न होंगी बेटियां तो
कोख कहाँ से लाएंगे
बेटा होकर भी न पा सकेंगे बेटा
यतीम हो जायेगी कायनात सारी
जिंदगी का सफर थम जायेगा।
मत हो निराश माँ
न हो दुखी
खबर सुन मेरे आने की
दे दे मोहलत मुझे भी
गर्भ में पलने की ।

डॉ लता अग्रवाल
भोपाल

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