कविता · Reading time: 2 minutes

#औरत#

मैं औरत हूँ।
मैं स्त्री, मैं जननी।
मैं पुरूष बल की पौरस हूँ।
मै औरत हूँ।।

करूँ श्रृंगार तो
रूपवती मेनका हूँ।
काजर डारूँ तो
कजरारी माँ काली हूँ।
साँवली-सलोनी हूँ।
श्वेत हूँ पद्मासना,
मैं शर्बती हूँ।
रूपवती, मैं कामवती।
मैं सती-सावित्री,
पतिव्रता सीता।
मैं कामिनी, मैं दामिनि,
मैं कमालिनी।
मैं सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति देवी हूँ।
सर ऊँचा रहे मेरा।
मैं ही शीर्षक हूँ।
मैं औरत हूँ।।

हर्ष-उल्लास हो
या हो दःख-विषाद।
मैं सरल ,मैं स्वच्छन्द।
मैं ज्वाला, मैं प्रचण्ड।
मैं अचल,मैं अविचल।
संकट में अडिग खडी रहती।
रण क्षेत्र में अडी रहती,
मैं रणबांकुरी रानी लक्ष्मी हूँँ।
मैं प्रबल-प्रखरा।
संग-संग चलती सदा।
मैं ही सबके कुर्बत हूँ।
मैं औरत हूँ।।

मैं तरनी,मैं धारा।
मैं सरस,मैं खरा।
मैं लग्नकला,मैं विमला,
मैं परीलता।
कभी चंचलता तो कभी मंद-मंद।
कभी स्थिर तो कभी व्याकुलता।
मैं धीरज-धरनी,
मैं सबला नारी।
मैं तली,मैं बुलन्दी।
हासिल करूँ हर लक्ष्य,
मै हठी।
मैं मेहनतकश,मैं अभेद किला।
अंधेरे में तीर चलाकर,
प्रकाश फैलाऊँ।
उस गांडिव का मैं ही तरकश हूँ।
मैं ही शक्ति,मैं ही कवच हूँ।
मैं औरत हूँ।।

मैं आस्तिक, मैं स्वयमवरा।
मैं सुलोचना, मैं ममता।
मैं अखन्डज्योति,प्रज्वलित प्रवरा।
मैं तल्लीन,मुखर।
मैं कुशाघ्र,कर्मवीरांगना।
बाँह खोलूँ,मैं भुजनी।
नभ समेटूँ, आँचलतले।
मैं जमीं,
मैं ही फलक हूँ।
मैं औरत हूँ।।

मैं तिलकशोभिनी, व्रतशोहिनी।
माथे की चँदनी,
चाँद की चाँदनी।
मैं मनमोहिनी, मंदाकिनी।
मैं जन्मदायिनी माता।
पाँव धरूँ जिस द्वारे,
वास करूँ बनके देवी लक्ष्मी।
हरक्षण धन-धारन करूँ,
मै धनकुबेर की धानी चौखट हूँ।
मैं औरत हूँ।।

••••••• ••••••• •••••••
••••••• ••••••• •••••••
मौलिक व स्वरचित कवि:- Nagendra Nath Mahto.
(गायक,गीतकार, संगीतकार व कवि)
All copyright :- Nagendra Nath mahto .

4 Likes · 8 Comments · 191 Views
Like
25 Posts · 3.4k Views
You may also like:
Loading...