कविता · Reading time: 1 minute

*”ओ रे मांझी तू चल’*

*”ओ रे मांझी तू चल”*
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दुर्गम पथ प्रदर्शक पथिक थक मत ओ रे मांझी तू आगे बढ़ते चल…..
सागर में उफनती लहरों के साथ में अपनी मंजिल तय करते चल…
मीठी से ख्वाबों को सजाये निराले अंदाज में नैया पार करते हुए चल….
नील गगन में उन्मुक्त हवाओं संग पतवार खोते हुए चल….
हौसलों की उड़ान भर कर मंद गति से निरन्तर चल……
संपूर्ण धाराओं को चीरते हुए स्वछंद हवाओं संग बहते हुए चल….
उन सतरँगी किरणों की प्रकाश में छटाओं को निहारते हुए चल….
अंबर के अनगिनत चमकते सितारों संग जन्नत की सैर करते हुए चल ….
स्वप्न लोक की दुनिया में सीमित दायरों में आगे कदम बढ़ाते हुए चल…..
समय सीमाओं में बंधकर समुंदर की गहराइयों को नापते हुए चल…
ओ रे मांझी तू निरन्तर प्रभु सुमिरन कर गुणगान करते भवसागर से तरते हुए चल…..
ओ रे मांझी अपनी नैया पतवार से खोते हुए हिम्मत व साहस के साथ बढ़ते मुस्कराते हुए चल….! ! !
*शशिकला व्यास* ⛳🚣‍♀️🚣🏾‍♂️🚣🏾‍♂️🚣🏾‍♂️🚣🏾‍♂️🚣🏾‍♂️🚣🏾‍♂️🚣🏾‍♂️🚣🏾‍♂️🚣🏾‍♂️

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