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ओ मेरे भारत—

कृष्ण मलिक अम्बाला

कृष्ण मलिक अम्बाला

कविता

August 31, 2016

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भारत माता से कुछ पूछती हुई मेरी पंक्तियाँ ।
मस्ती के साथ आनंद लेते हुए लीजिये इनका लुत्फ़

ओ मेरे भारत तेरा इतिहास अब बिखर गया ।
मन हुए काले लोगों के, चेहरा निखर गया ।

ओ मेरे भारत तेरे संस्कार न जाने किधर गए ।
जीन्स के चक्कर में दुपट्टे छाती से उतर गए।।

ओ मेरे भारत तेरा युवा न जाने क्यों सिकुड़ गया ।
क्यों नशे की जंजीरो में इतना जकड़ गया ।।

ओ मेरे भारत तेरे ग्रन्थ अब हो लुप्त गए ।
सब छोड़ कर तेरी महिमा , कैसे हो मुक्त गए ।।

ओ मेरे भारत पुरुष का कैसा हो रूप गया ।
बेरोजगारी का कीड़ा उनका खून चूस गया ।।

ओ मेरे भारत नारी का कैसा हो व्यवहार गया ।
उसके सपनों की आंधी में बिखर परिवार गया ।।

ओ मेरे भारत बच्चों का किधर बचपन गया ।
45 का जवान भी लगता जैसे पार पचपन गया ।।

ओ मेरे भारत बहनों का कहाँ प्यार गया ।
नाम को बस रह राखी का त्यौहार गया ।।

ओ मेरे भारत भईयों का खो रोब गया ।
बहनों के सीने जैसे ये खंजर खोब गया ।।

ओ मेरे भारत पिता बन अब रोबोट गया ।
लालच की दौड़ में फर्ज को दबोच गया ।।

ओ मेरे भारत इंग्लिश की रटना शुरू कर कौन गया ।
अच्छी खासी माता का पिघल मोम(mom) गया ।।

ओ मेरे भारत इस रटना का असर पिता पर भी वैध हुआ ।
बस तभी से बापू का ओहदा बढ़कर डैड (dead) हुआ ।।

ओ मेरे भारत आलस की आंधी में हर कोई हो कर्महीन गया ।
भूलकर सब सपने ऊँचे , विकारों के हो अधीन गया ।।

ओ मेरे भारत कर कुछ अब चमत्कार ।
लौटा दे वापिस आदर सत्कार।।
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आपके कमेंट मेरे लिए रामबाण हैं जी ।
01.06.2016
© कृष्ण मलिक

Author
कृष्ण मलिक अम्बाला
कृष्ण मलिक अम्बाला हरियाणा एवं कवि एवं शायर एवं भावी लेखक आनंदित एवं जागृत करने में प्रयासरत | 14 वर्ष की उम्र से ही लेखन का कार्य शुरू कर दिया | बचपन में हिंदी की अध्यापिका के ये कहने पर... Read more
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