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** ओ मृग नयनी **

भूरचन्द जयपाल

भूरचन्द जयपाल

गीत

March 10, 2017

ओ मृगनयनी
तेरी आँखों को मैं क्या कहूं ओ मृग नयनी
सागर सा है हिया तेरा उसमें है खारा पानी
ओ मृगनयनी
सागर सी गहराई लिए खंजन सी आँखे हैं तेरी
आँखों के अंजन में छुपा रखा है कौन सा राज
ओ मृगनयनी
समन्दर है कौन सा दिल में तेरे दिलबर जानी
मैंने जब देखा था तुझको सूरत लगी पहचानी
ओ मृगनयनी -2
आँखों में तेरे कौन सा सागर बसा है जो
दिनरात तेरी आँखों में भरा रहता है पानी
ओ मृगनयनी -2
जब तेरी मेरी पहली मुलाक़ात हुई तो मैंने पूछा
आँखों में काजल है या है अंखियां कजरारी
ओ मृगनयनी -2
आज भी तुझको सागर किनारे दिल ये पुकारे
तूं जो नहीं तो मेरा कोई नही है सागर किनारे
ओ मृगनयनी ओ मृगनयनी
?मधुप बैरागी

Author
भूरचन्द जयपाल
मैं भूरचन्द जयपाल स्वैच्छिक सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना आदि... Read more
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