ओ मंजिल के मुसाफिर

एक मित्र को जन्म दिन पर प्रोत्साहित करती एक रचना ।
आप भी अपने मित्र को ये पैगाम दे सकते हैं ।

ओ मंजिल के मुसाफिर
चलते रहना सुबह और शाम
मेरा बताना और तेरा सुनना
कभी ने रुकने पाये , तेरे हाथों से शुभ काम
वक़्त बदले सदिया बदले , तूने नहीं बदलने अपने उसूल
ले जा बुलन्दियों पर देश को , देती कसम तुझे ये मिट्टी की धूल
ना रुकना और ना ही थकना
विचारों से ही लड़ना है
लिखकर खूब कलम चलाकर
ऐसे ही आगे बढ़ना है
नित नित पढ़ना , आगे बढ़ना
इस ऊर्जा के आह्वान को
और भी लेजा आगे तू
मेरे देश महान को
आने वाली पीढ़ियों को तूने
समझाकर जाना है
लिखकर कलम से अपनी
राज जिंदगी के बतलाना है
कर तेज़ धार कलम की अब तू
होजा लक्ष्य पर सवार
आज हुआ तेरा जन्म नया
यही करना हर वर्ष विचार
अच्छे को कर नित प्रोत्साहित
बुरे को दे शर्म से मार
तेरे आचरण से सब बदले
ऐसा कर कलम का वार
पुरानी बीती भूल जाना
आगे है तूने बस बढ़ते जाना
सरल शब्दों में दी तुम्हे ऊर्जा
बस यही राग तुमने नित पढ़ते जाना

बस यही राग तुमने नित पढ़ते जाना ।।

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like Comment 0
Views 155

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share