ऑनलाइन प्यार

पहले वो सूरत दिखाने खिड़की पर आया करते थे,
अब हमारे पोस्ट्स व् कमेंट्स पढ़ने ऑनलाइन आया करते हैं।

पहले उनके तसव्वुर में चाय की प्यालियाँ खाली होती थीं,
अब उनके इंतज़ार में फ़ोन का नेट बैलेंस ख़त्म हुआ जाता है।

पहले उनकी खिड़की की ओर देखते गर्दन अकड़ जाती थी,
अब उनके ऑनलाइन आने की आस में चश्मे का नम्बर बढ़ता जाता है।

पहले उनकी दीद होने से हमारी जैसे ईद मन जाती थी,
अब उनकी पोस्ट पढ़कर जैसे होली के रंग बिखर जाते हैं।

तब भी हमारी सांसें रुकने से पहले खिड़की खुलती ज़रूर थी,
अब भी बैटरी ख़त्म होने से पहले वो ऑनलाइन आते ज़रूर हैं।

———— शैंकी भाटिया
सितम्बर 22, 2016

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