Sep 21, 2019 · कविता
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ऑनलाइन का “क्रेज़”

ऑनलाइन का क्रेज

ऑनलाइन शॉपिंग का,
कृऐज हो रहा बहुत तेज।
घर बैठे सामान बुलाते,
अब करते नहीं वेट।।

ऐसा ही चलता रहा था तो,
1 दिन वह भी आएगा।
अंतिम यात्रा में तुझको,
डिलीवरी ब्वॉय छोड़ने जाएगा।।

ऑनलाइन के चक्कर में,
पड़ोसी पड़ोसी को नहीं जानता।
सारी वस्तुएं घर आ जाती है,
पड़ोस का दुकानदार नहीं जानता।।

सामान् खरीदते ऑनलाइन,
चंदा मांगने जाते हो।
शर्म नहीं आती तुमको,
कौन सा जीवन जीते हो।।

तुमसे ही जीवन उसका,
राशन कपड़ा या तरकारी।
उसे बेच वह परिवार चलाते,
ऑनलाइन से परेसां व्यापारी।।

कहे पा”रस” घर से परिवार परिवार से पड़ोस पड़ोस से मोहल्ला।
समाज ऐसे ही बनता है, जुड़े रहो एक दूसरे से करो हो हल्ला।।

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पारस जी
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मैं कोई कवि नहीं हूं, बस विचारों के प्रवाह को शब्दों में बांध लेता हूं,... View full profile
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