ऐ ज़िन्दगी  

ऐ ज़िन्दगी,
देखे तेरे कई नज़ारे,
साथ तेरे कई पल है गुज़ारे,
बिछड़ जाएगी तू भी एक दिन,
चलता फिर भी मैं तेरे सहारे,
कभी लगे तू शरबत सी मीठी,
कभी लगे मैं ज़हर पीता हूँ,
कभी लगे तू हर पल बोझिल,
कभी ख़ुशी से मैं तुझे जीता हूँ,
कभी रहती मुझसे दूर तू,
कभी करती तू मुझसे वफ़ा है,
अपनापन कभी दिखता है तुझ में,
कभी रहती तू मुझसे ख़फा है,
तुझ पे करूँ मैं भरोसा कैसे,
एक दिन तू भी तो रूठ जाएगी,
तुझसे कोई उम्मीद करूँ मैं कैसे,
एक दिन तू भी तो छूट जाएगी,
कभी की ना तुझसे कोई शिकायत,
बेफिक्र घूमता मैं तुझे सम्हाले,
अब तक तुझको मैं जीता था,
अब करता मैं खुद को तेरे हवाले,
तुझ में तो एक नशा है ऐसा,
पुरानी कोई शराब हो जैसे,
तुझ पे हुआ मैं दीवाना ऐसा,
किसी हसीना का शबाब हो जैसे,
कभी हो जाता तुझसे तंग मैं,
कभी तू भी मुझसे परेशान बहुत है,
कभी रंग जाता मैं तेरे रंग में,
कभी तू भी मुझसे हैरान बहुत है।

कवि-अंबर श्रीवस्तव

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