ऐ गुलाब !

” गुलाब “

क्या डर है गुलाब तुझको ?
जो कांटो के बीच खिला है ।
अरे ! हुस्न के दिवानोंं को तू ही तो मिला है।

तुझ पर फिदा होने वाले,
क्या जाने तेरी कुर्बानी को ?
राग – रंग में डूबे ,
क्या जाने तेरी मेहरबानी को !
तू पूछ! सवाल उनसे जरा ,
वो बेदर्दी जाने है क्या दर्द तेरा ?

तन पर जो शूल लिए फिरता है तू,
तेरे दर्द को जाने मैं और तू।
तेरी पीड़ा के घाव लिए फिरता हूँ,
जुग-जन-जीवन की तान लिए फिरता हूँ।

ऐ गुलाब ! आ गले लग मुझसे,
तेरा हमदर्दी आया है।
तेरी तरह ही ये गुलाम ,
दुनिया में लुटने आया है।

(भावुक होकर गुलाब कहता है आगे ..)

‘आ बैठ जरा तुम-हम ,रो ले कुछ देर घड़ी।
अंत सफर है मेरा , मिल ले मुझसे एक घड़ी ‘

मौलिक स्वरचित
सर्वाधिकार सुरक्षित

राजेश कुमावत ‘ज्ञानीचोर’
शेखावटी अंचल, राजस्थान

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अविवाहित, पसंद ग्रामीण संस्कृति, रूचि आयुर्वेद में MA HINDI B.ed,CTET NET 8time JRF Hindi Phd...
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