ऐे ज़िंदगी

ऐे ज़िंदगी मुझे तुझसे मोहब्बत क्युँ है,
तू हसती है मेरे जख्मों पर ,
फिर मुझे तेरी आदत क्युँ है |
गिरना भी तूने सिखाया,
उठना भी तूने सिखाया,
फिर तुझे मेरी जरुरत क्युँ है ||
कुछ तो दिलचस्बी है,
मेरी सांसो में तुझे,
आखिर मुझसे इतनी चाहत क्युँ है |
गिर कर भी मैंने,
सीखा है हसना ज़िंदगी से,
आज ज़िंदगी ही मेरी इबादत क्युँ है ||
ज़िंदगी को समझना है तो,
चलना सीखो रुकना नहीं,
चलते मुसाफिरों को ये
मंजिल से मिलाती है |
सिर्फ जीना ज़िंदगी नहीं,
ज़िंदगी तो वो है,
जो औरो के काम आती है ||

– सोनिका मिश्रा

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