गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

ऐसे बसे शहर में (शहरी करण)

ऐसे बसे शहर में गुमनाम हो गए
उठने की हसरतों में बदनाम हो गए।
हम सोचते हैं अक्सर,
इससे था लाख बेहतर।
अपना वो टूटा फूटा,
छप्पर का छोटा घर।
ऐसी हुई घुटन कि परेशान हो गए।
ऐसे बसे शहर में गुमनाम हो गए।
इन ऊंची मंजिलों में बेदम हुए हैं हम।
खिड़कियों की आड़ में घुटने लगा है दम।
सब खुद से ही हैं बोझिल किसको सुनाएं गम।
गम देखे दूसरों का खुद का लगे हैं कम।
अपनों से ही अब तो अंजान हो गए।
ऐसे ही बसे शहर में गुमनाम हो गए उठने की हसरतों में बदनाम हो गए।
अपनों की भीड है पर ,
कोमा में हैं सभी अब।
दौलत की अंधी दौड़ में,
मशगूल हैं सभी अब।
रिश्तो का मीठा बंधन बांधता नहीं।
अब तो पुराना घर भी मुझे पहचानता नहीं।
रेखा यूं सारे रिश्ते बदनाम हो गए।
ऐसे ही बसे शहर में गुमनाम हो गए।
उठने की हसरतों में बदनाम हो गए।

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