ऐसी आज़ादी से गुलामी अच्छी थी

कित के आज़ाद होये हाम चैन सुख म्हारा खोग्या।
दो टुकड़े होये भारत माता के न्यू जुल्म घना होग्या।।

इसी आज़ादी त हाम सौ गुणा गुलाम भले थे।
रोज के होते बलात्कारां त वे कत्लेआम भले थे।
आज के नेताओं त वे अंग्रेज बदनाम भले थे।
सब जान के भी कुछ ना कर सकदे न्यू रोम रोम रोग्या।।

तन त आज़ाद होग्ये पर सोच रही गुलामा आली।
कुछ भूखे मरें आड़े कुछ कर रहे कमाई काली।
तमाशगर बने हम देखाँ तमाशा बजावाँ ताली।
बने जुल्मी अन्यायी हाम म्हारा जमीर भी सोग्या।।

पहले अंग्रेज लुटा करते हमने आज अपने लूटें।
कुछ लोग देश नै अपनी प्रोपर्टी समझ ऐश कुटें।
दीमक ज्यूँ म्हारे देश नै भीतर ऐ भीतर वे चुटें।
पल पल रंग बदलें देख गिरगिट बी मुंह लकोग्या।।

गरीबां के मुंह का निवाला, शहीदां का कफ़न बेचें।
चंद सोने चाँदी के सिक्कां खातर अपना वतन बेचें।
आज़ादी का के फायदा जब भूखे मरदे लोग तन बेचें।
“”सुलक्षणा”” तेरा लिखना बदलाव का बीज बोग्या।।

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लिख सकूँ कुछ ऐसा जो दिल को छू जाये, मेरे हर शब्द से मोहब्बत की...
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